भारतीय चुनाव प्रणाली
भारतीयों का 'चुनाव'
कई वर्षों के कड़े संघर्षो के बाद 15 अगस्त, 1947 में भारत, आज़ादी को प्राप्त करने के साथ ही एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य बना जिसने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाया और इसे विश्व के अंदर नयी पहचान दी। 26 जनवरी, 1950 को इतिहास में यह ऐतिहासिक घटना आज 'भारत का संविधान' नामक पुस्तक में नियमो और कानूनों के रूप में लिखित भारत की आने वाली हर एक पीढ़ी का मार्गदर्शन करती है जो हर एक भारतीय को इसके होने पर गौरवान्वित महसूस कराती है और इसी पुस्तक के अंतगर्त निहित है लोकतंत्र की महत्वपूर्ण प्रक्रिया- चुनाव या निर्वाचन।
लोकतंत्र में शक्ति का केंद्र जनता है। प्रत्यक्ष रूप से चुनावों में जनता की भागीदारी प्रतिनिधियों का चुनाव करती है जिससे राज्य की विधायिका एवं कार्यपालिका(लेजिस्लेचर एंड एग्जीक्यूटिव) को गठित किया जा सके।
उद्देश्य:
संविधान में आम चुनावों के होने से ही हर पांच वर्षों के बाद सरकार का निर्माण होता है और इन चुनावों को स्वतंत्र रूप से करवाने के लिए निर्वाचन आयोग(इलेक्शन कमीशन) की स्थापना 1950 में हुई थी।चुनाव का उद्देश्य जनता द्वारा ऐसे प्रतिनिधियों को चुनना है जो सरकार में रहकर देश को विकास और प्रगति की राह पर ले जाएँ। इसलिए यह जरूरी है कि मतदाता भयमुक्त और सोच-समझकर मतदान करें।
आज मतदान करने का संवैधानिक अधिकार हर एक भारतीय व्यक्ति जो 18 वर्ष पूर्ण कर चुका हो, को है।1952 में हुए पहली बार आम चुनावों में मतदाताओं की न्यूनतम आयु 18 वर्ष की न होकर 21 वर्ष थी जिसे बाद में संशोधन कर घटाकर 18 वर्ष रखा गया।
भारत की इस चुनाव प्रणाली में कई कमियाँ भी है जिसके चलते कई चुनावी दल इसका दुरूपयोग भी करते है। राजनीतिक दल चुनावों में विजयी होने के लिए अनैतिक कार्यो द्वारा कई तरह के प्रलोभन जनता को देते है। इसके अलावा दल-बदल, वोटो की बिक्री, भयभीत करना, जाति व धर्म के आधार पर वोट माँगना इस चुनाव प्रणाली के स्वाद को फीका कर देती है। जिसके कारण कहीं न कहीं मतदाता का विश्वास इस प्रक्रिया में कम हो जाता है और वो इसमें हिस्सेदारी नहीं लेता। हाल ही के चुनावो में EVM के खिलाफ शिकायतें एवं प्रदर्शन जनता के बीच एक प्रश्न खड़ा करती है। यदि जनता ही अपने मतों के अधिकार का पूर्ण व स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं करेगी तो क्या जैसे स्वप्न हम भारत को विश्व पटल के मुखर राष्ट्र के रूप में लाने का देखते है वो संभव हो पायेगा?
'आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है '
आवश्यकता यह है कि चुनाव प्रणाली में समयानुसार सुधारों और इस क्षेत्र में आविष्कार को जगह दी जाये। सबकी साझेदारी से नए क़ानून लाये जाये ताकि प्रगति और विकास की राह में आई बाधाओं को पुरानी पुस्तक में लगी धूल की तरह उड़ाया जा सके।

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